गोगा जी महाराज का जन्म राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा गांव में भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी, विक्रम संवत 1003 को राजा जेवर सिंह और माता बाछल देवी के घर हुआ था. वह गुरु गोरखनाथ के शिष्य थे और उनके राज्य का विस्तार सतलुज से हरियाणा तक था. उन्हें जाहरवीर, गोगा वीर और पीर के रूप में जाना जाता है, और सांपों के देवता के रूप में उनकी पूजा की जाती है.
किंवदंती के अनुसार गोगा जी का जन्म नाथ संप्रदाय के योगी गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुआ था. योगी ने ही इनकी माता बाछल को प्रसाद रूप में अभिमंत्रित गुग्गल दिया था जिसके प्रभाव से महारानी बाछल से गोगा देव (जाहरवीर) का जन्म हुआ था.
गोगा जी को “नागों के देवता” के रूप में भी जाना जाता है और लोग मानते हैं कि वह साँपों के काटने से उनकी रक्षा करते हैं. किंवदंतियों के अनुसार, उन्होंने लोगों को विभिन्न बीमारियों और कष्टों से ठीक करने में मदद की है. कहा जाता है कि उनके भक्तों के सभी दुख उनकी शरण में दूर हो जाते हैं.
वह शक्ति और न्याय के प्रतीक हैं और अपने भक्तोंको ये आशीर्वाद देते हैं. एक अन्य चमत्कार में गुरु गोरखनाथ के साथ गोगा जी ने एक सूखे बाग को फिर से हरा-भरा कर दिया था, जिससे लोगों में उनकी भक्ति और शक्ति के प्रति और विश्वास बढ़ा.
गोगामेड़ी मंदिर, राजस्थान के हनुमानगढ़ से लगभग 120 किमी दूर स्थित है. यह श्री गोगाजी महाराज को समर्पित सबसे प्रमुख और प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो एक योद्धा-संत माने जाते हैं और सांपों तथा बुरी आत्मा ओंसे रक्षा करते हैं. गोगाजी एक प्रतिष्ठित चौहान राजपूत और गुरु गोरखनाथ के प्रमुख शिष्य थे. उनकी दिव्य उपस्थिति आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देती है.
हर वर्ष भाद्रपद नवमी को गोगामेड़ी मेले में राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों से श्रद्धालु आते हैं और समाधि पर अगरबत्ती, नारियल और प्रार्थना अर्पित करते हैं.
मंदिर की वास्तुकला वर्तमान संरचना को ता : 26 जून 1911 को बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के शासनकाल में सफेद संगमरमर में पुनर्निर्मित किया गया था. दर्शनीय मंदिर पारंपरिक और इंडो-इस्लामिक वास्तुशिल्प शैलियों का सुंदर संगम है, जिसमें बारीकी से उकेरी गई समाधि, मूर्ति, और नरसी पांडे व भज्जू कोटवाल के चित्रण शामिल हैं.
2016 से 2019 तक, राजस्थान सरकार ने व्यापक जीर्णोद्धार कार्य किए, जिससे मंदिर की आध्यात्मिकता को बनाए रखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधाओं में सुधार किया गया. यहांपर
हर साल 50 लाख से अधिक भाविक श्रद्धालुओं आते है. यह मंदिर धार्मिक सद्भाव का प्रतीक बना हुआ है, जहां भारत और विदेशों से भक्तों का जमावड़ा लगता है.
उनकी शादी सरियल (सिरियारी) के राजाकी पुत्री से हुई थी. उनका राज्य सतलुजसे हरियाणा तक फैला हुआ था.
उन्हें मुख्य रूप से सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है, और सर्पदंश से मुक्ति के लिए उनकी पूजा की जाती है.
गोगा जी हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों द्वारा पूजे जाते हैं, जिससे वे सांप्रदायिक सद्भावका प्रतीक हैं. उनकी समाधि हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी में स्थित है, जहाँ एक हिंदू और एक मुस्लिम पुजारी मिलकर पूजा करते हैं.
गोगाजी चौहान के वंशज मुख्य रूप से कायमखानी चौहान मुस्लिम राजपूत हैं और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं. गोगाजी के बाद उनके भाई बैरसी और फिर पुत्र उदयराज ददरेवा के उत्तराधिकारी बने. गोगाजी से लगभग तेरह पीढ़ियों बाद, उनके वंशज कर्म सिंह चौहान (जिसे फिरोज शाह तुगलक ने कायम खां नाम दिया था) ने मुस्लिम धर्म अपना लिया.
आज भी कायमखानी चौहान खुद को गोगाजी का वंशज मानते हैं और कई हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, साथ ही गोगाजी की पूजा भी करते हैं. गोगाजी के पिता राजा जेवर सिंह चौहान थे, जिनके चार पुत्र थे…
(1) गुगा (गोगाजी), (2) वैरसी, (3)
सेस और (4) धरह.
गोगाजी की मृत्यु के बाद, उनके भाई बैरसी और फिर उनके पुत्र उदय राज ददरेवा के उत्तराधिकारी बने जिसके बाद जसकरण, केसोराई, मदनसी, विजयराज, पृथ्वीराज, गोपाल, लालचंद, अजयचंद और जैतसी जैसे शासक हुए.
कायमखानी चौहान आज राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में रहते हैं और खुद को गोगाजी का वंशज मानते हैं.
गोगाजी के घोड़े का नाम जवाड़िया था, जो एक नीली घोड़ी थी. वह अपनी नीली घोड़ी पर सवार होते थे और उन्हें “नीले घोड़े के सवार” के नाम से भी जाना जाता है.
कर्नल टॉड के अनुसार, गोगाजी ने महमूद गजनवी के साथ अपने 47 पुत्रों और 60 भतीजों के साथ युद्ध किया और प्राणों की आहुति दी. इस युद्ध में उनका सिर ददरेवा में गिरा और धड़ नोहर में गिरा. इसी कारण ये दोनों स्थान उनके पवित्र स्थल माने जाते हैं. कुछ कथाओं के अनुसार, गोगाजी अपने चचेरे भाइयों अर्जन और सर्जन के साथ जमीन को लेकर हुए विवाद में मारे गए थे.
एक और लोकप्रिय कथा के अनुसार, गोगाजी ने धरती से अपने लिए स्थान मांगा और धरती फटकर उन्हें अपने अंदर समा गई. इस कारण वे गोगामेड़ी में समा गए. गोगाजी को “जाहरवीर” के नाम से जाना जाता है और उनकी मृत्यु के बाद महमूद गजनवी ने उन्हें ‘जाहर पीर’ की उपाधि दी थी. सांपों के दंश से बचाने के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है, और इसलिए वे ‘नागों के देवता’ के रूप में भी पूजे जाते हैं.
गोगा जी पर बनी फ़िल्म :
जाहरवीर गोगा पीर भाग 1, 2 और 3″. ये फिल्में गोगा जी की जीवन गाथा और चमत्कारों को दर्शाती हैं.
“जाहरवीर गोगा पीर” :
यह एक लोकप्रिय फिल्म है, जिसके कई भाग YouTube पर देखे जा सकते हैं.
“जय गुग्गा जहर पीर जी” :
यह 2016 में रिलीज़ हुई एक और फिल्म है, जिसे राज गिल ने निर्देशित किया है.
अन्य फिल्में : गोगा जी पर कई अन्य फिल्में भी हैं जो “जाहरवीर गोगा जी” कथा या उनके जीवन पर आधारित हैं और विभिन्न भागों में उपलब्ध हैं, जैसे कि यू ट्यूब पर. ( समाप्त )
