अफ्रीका की आदिवासी जनजातियां.

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अफ्रीका में अनेक आदिवासी जन जातिया है, जो अपने अपने अनोखे रीति – रिवाज़ और परंपरा के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है. इसमें कुछ प्रमुख आदिवासी जनजातियों में सैन बुशमैन, मासाई, ज़ुलु, योरूबा, बर्बर, पिग्मी, हिम्बा, और डोगोन जैसी जनजातियां शामिल हैं. इनमें से कुछ, जैसे कि सैन (बुशमैन) और पिग्मी, अपनी प्राचीनता के लिए जाने जाते हैं, जबकि अन्य अपनी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं.

प्रस्तुत है, अफ्रीका की कुछ प्रमुख आदिवासी जनजातियाँ :

सैन (बुशमैन) :

ये दक्षिणी जनजाति अफ्रीका के सबसे पुराने निवासी माने जाते हैं और कालाहारी रेगिस्तान में रहते हैं.सैन या बुशमैन दक्षिणी अफ्रीका के एक स्वदेशी शिकारी-संग्रहकर्ता लोग हैं, जो मुख्य रूप से बोत्सवाना, नामीबिया और अंगोला में निवास करते हैं.

वे खोईखोई समूह से संबंधित हैं और अपनी प्राचीन संस्कृति और शिकार संग्रह की जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं, हालांकि उनकी पारंपरिक जीवनशैली आधुनिक दुनिया के दबावों के कारण खतरे में है.

सैन और बुशमैन दोनों नाम प्रयुक्त होते हैं. बुशमैन डच और अफ़्रीकानर मूल का शब्द है, जिसका अर्थ “झाड़ी का आदमी” है. सान खोईखोई भाषाका शब्द है, जिसका अर्थ “बाहरी” होता है.

यह आदिवासी जनजाति मुख्य रूप से बोत्सवाना, नामीबिया और अंगोला के कालाहारी रेगिस्तान और आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती है.वे पारंपरिक रूप से शिकारी-संग्रहकर्ता हैं, जो कीड़ों और पौधों का सेवन करते हैं.

सैन दुनिया की सबसे पुरानी सतत संस्कृतियों में से एक मानी जाती है, जिनके पास समृद्ध लोक कथाएं और चित्रकला की परंपरा है. आधुनिक समय में, उनकी पारंपरिक भूमि पर कई दबावों के कारण, उनकी संख्या कम हो गई है और उनकी जीवनशैली खतरे में पड़ गई है.

मसाई :

ये केन्या और तंजानिया में रहने वाली एक प्रसिद्ध जनजाति है, जो अपनी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं के लिए जानी जाती है. मसाई एक निलोटिक जातीय समूह है जो मुख्य रूप से केन्या और उत्तरी तंजानिया में निवास करता है. यह अर्ध-खानाबदोश जनजाति है जो अपनी विशिष्ट संस्कृति, योद्धा परंपरा और पशुपालन पर निर्भर जीवनशैली के लिए जानी जाती है. मसाई लोग लाल लबादे और जटिल गहने पहनते हैं और वे पारंपरिक रूप से अपनी गायों की देखभाल और रक्षा करते हैं.

और पशुपालन पर निर्भर हैं, खासकर मवेशियों पर, जिनकी वे बहुत देखभाल करते हैं. वे अक्सर अपने मवेशियों के लिए चरागाहों की तलाश में एक जगहसे दूसरी जगह जाते हैं. इनकी मूल भाषा मसाई है, जो निलोत-सहारन भाषा समूह का हिस्सा है. वे तंजानिया और केन्या की आधिकारिक भाषाएं, स्वाहिली और अंग्रेजी भी बोलते हैं.

मसाई अपनी योद्धा परंपरा के लिए जाने जाते हैं, और युवा पुरुषों को वयस्कता में प्रवेश के लिए “एमोराटा” नामक एक संस्कार से गुजरना पड़ता है, जिसके बाद वे योद्धा बन जाते हैं.

ये लोग विस्तृत गायन और नृत्य के लिए भी प्रसिद्ध हैं, जो उनकी सांस्कृतिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. वे अक्सर केवल स्वरों का उपयोग करके लयबद्ध गीत गाते हैं.

आधुनिकीकरण और शहरीकरण के कारण पारंपरिक जीवनशैली को बनाए रखने में कठिनाई हो रही है. वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन परियोजनाओं के कारण उन्हें अपनी पारंपरिक भूमि से विस्थापित किया जा रहा है.

जलवायु परिवर्तन और सूखे से उनकी चराई की जरूरतों पर असर पड़ रहा है.

ज़ुलु :

यह दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी जनजाति है, जो अपनी योद्धा विरासत के लिए प्रसिद्ध है. ज़ुलु जन जाति दक्षिण अफ्रीका का सबसे बड़ा जातीय समूह है, जो मुख्य रूप से क्वाज़ुलु-नटाल प्रांत में निवास करती है. वे एक न्गुनी-भाषी लोग हैं और उनका एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास है, जिसमें 19वीं सदी के शुरुआत में शाका ज़ुलु के नेतृत्व में एक शक्तिशाली ज़ुलु साम्राज्य का उदय शामिल है.

उनकी पहचान साझा उत्पीड़न के अनुभव की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुई और वे अपनी मजबूत सांस्कृतिक विरासत, जैसे कि जीवंत कला और परंपराओं के लिए जाने जाते हैं. ज़ुलु जनजाति दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी जातीय समूह है, जिसकी अनुमानित जनसंख्या 10-12 मिलियन है और वे मुख्यतः क्वाज़ुलु-नटाल प्रांत में रहते हैं.

उनकी भाषा इशिज़ुलु है, जो दक्षिण अफ्रीका की 12 आधिकारिक भाषाओं में से एक है.19वीं सदी में शाका ज़ुलु के नेतृत्व में, ज़ुलु जनजाति एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य में विकसित हुई. इस दौरान, शाका ने सैन्य सुधारों और रणनीतियों को लागू किया, जिसने उन्हें अपने दुश्मनों पर विजय पाने में मदद की.

ज़ुलु लोग अपनी जीवंत कला और प्रतीकात्मकता के लिए जाने जाते हैं, खासकर उनके मनके की कारीगरी में, जहाँ रंग और आकार संदेशों को व्यक्त करते हैं. वे अपने पूर्वजों की आत्माओं से भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंध रखते हैं और उनका मानना ​​है कि उन्हें इन आत्माओं को प्रसन्न करना होगा.

बहुत से ज़ुलु लोग ईसाई धर्म का पालन करते हैं, हालांकि पारंपरिक मान्यताएँ भी मौजूद हैं.

योरूबा :

यह नाइजीरिया और बेनिन जैसे देशों में रहती है और अफ्रीका की सबसे बड़ी जातीय समूहों मेंसे एक है. योरूबा पश्चिम अफ्रीका में रहने वाली प्रमुख जनजाति है, जो मुख्य रूप से नाइजीरिया के दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-मध्य भागों के साथ-साथ पड़ोसी बेनिन और टोगो के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती है.

वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कला, भाषा और ऐतिहासिक साम्राज्यों के लिए जाने जाते हैं, और उनकी कुल जनसंख्या अफ्रीकी महाद्वीप पर लाखों में है. योरूबा लोग मुख्य रूप से नाइजीरिया में निवास करते हैं, जो वहां के सबसे बड़े जातीय समूहों में से एक हैं. वे बेनिन और टोगो जैसे पड़ोसी देशों में भी पाए जाते हैं. वे योरूबा भाषा बोलते हैं, जो एक सुरभेदी भाषा है और नाइजर-कांगो भाषा परिवार की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है.

योरूबा लोगों का समृद्ध इतिहास है और उन्होंने कला, साहित्य और धर्म में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. ओयो साम्राज्य के दौरान, योरूबा लोगों ने अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव से पड़ोसी जनजातियों पर दबदबा बनाया था. इले-इफ़े जैसे शहरों में उनका शहरीकरण का एक अनूठा तरीका विकसित हुआ.

वे अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें लोहारी, चमड़े का काम, बुनाई, कांच बनाने और लकड़ी की नक्काशी शामिल है. इसके

अमेरिकी और क्यूबा जैसे देशों में भी बड़ी संख्या में योरूबा वंश के लोग मौजूद हैं, जो अटलांटिक दास व्यापार के कारण वहां पहुंचे थे.

बर्बर :

ये उत्तरी अफ्रीका के स्वदेशी लोग हैं, जो मोरक्को, अल्जीरिया और ट्यूनीशिया जैसे देशों में पाए जाते हैं.

अफ्रीका में “बर्बर जनजाति” के रूप में जानी जाने वाली कोई एक जनजाति नहीं है, बल्कि यह उत्तरी अफ्रीका के मूल निवासियों के लिए एक सामान्य शब्द है, जिन्हें अब अमाज़ीघ ( या इमाज़ीघेन ) के नाम से जाना जाता है. वे मिस्र से लेकर मोरक्को और पश्चिम अफ्रीका के कुछ हिस्सों तक एक विशाल क्षेत्र में निवास करते हैं. बर्बर लोगों के भीतर कई अलग-अलग समूह और भाषाएँ हैं, जैसे कि काबिल, चाउई, रिफ़ियन और मसमुदा.

“बर्बर” शब्द का प्रयोग मूल रूप से सातवीं शताब्दी में अरब विजय के बाद सामूहिक रूप से किया गया था और कुछ लोग इसे अपमानजनक मानते हैं, इसलिए वे “अमाज़ी” शब्द को पसंद करते हैं. बर्बर लोग उत्तरी अफ्रीका के माघरेब क्षेत्र में रहते हैं, जिसमें मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मॉरिटानिया, लिबिया और नाइजर के हिस्से शामिल हैं.

वे अपनी विशिष्ट भाषाओं ( जैसे तमाज़िग़्त) के लिए जाने जाते हैं. उनकी संस्कृति में मौखिक कहानी कहने, संगीत और नृत्य की समृद्ध परंपराएं हैं.

वे वस्त्र, मिट्टी के बर्तन और गहने बनाने में भी कुशल हैं, जिनमें अक्सर जटिल डिज़ाइन होते हैं.

वे कुशल कारीगर हैं और पारंपरिक रूप से ऊंट पालन और व्यापार करते रहे हैं. 20वीं सदी के उत्तरार्ध से एक आंदोलन चल रहा है जो सामूहिक अमज़ी जातीय पहचान को बढ़ावा देने और भाषाई अधिकारों की मांग कर रहा है.

पिग्मी :

ये मध्य अफ्रीका में रहने वाली छोटे कद की जनजातियाँ हैं, जिनमें अका, एफ़े, और म्बूटी शामिल हैं. पारंपरिक रूप से शिकार और संग्रहण पर निर्भर हैं. उनका जीवन वर्षावन से गहराई से जुड़ा हुआ है, और उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति उन्हें अन्य समुदायों से अलग करती है. ये मुख्य रूप से कांगो बेसिन, कैमरून, गैबॉन, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य और युगांडा जैसे मध्य और पूर्वी अफ़्रीकी देशों के घने वर्षावनों में पाए जाते हैं.

ये पारंपरिक रूप से शिकारी संग्राहक जीवनशैली जीते हैं, जिसका अर्थ है कि वे शिकार करके, मछली पकड़कर और जंगलों से फल और अन्य वस्तुएं इकट्ठा करके अपना भोजन प्राप्त करते हैं. पिग्मी लोगों का औसत कद बहुत कम होता है. आमतौर पर, पुरुषों की औसत ऊंचाई 150 से.मी. 4 फ़ीट 11 इंच से कम होती है, और महिलाओं की भी ऊंचाई कम होती है.

वे वर्षावन को गहराई से जोड़ते हैं और उनका विश्वास अक्सर प्रकृति की आत्माओं में होता है. संगीत और नृत्य उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें जटिल गायन और वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है. वे अक्सर पत्तों और छाल से बने अस्थायी घर बनाते हैं जिन्हें लगभग एक घंटे में बनाया और हटाया जा सकता है.

पिग्मी शब्द एक सामान्य समूह को संदर्भित करता है, और इसमें म्बुती, अका, बाका, इफ़े और त्वा जैसी जनजातियाँ शामिल हैं.

हिम्बा :

यह नामीबिया की एक प्राचीन और अर्ध-खानाबदोश जनजाति है, जो मवेशी पालने का काम करती है. हिम्बा जनजाति नामीबिया के उत्तर-पश्चिम में रहने वाला एक अर्ध-खानाबदोश समूह है, जो अपनी अनूठी परंपराओं, जैसे कि लाल गेरू और जड़ी-बूटियों से बने लोशन का उपयोग, और आधुनिक दुनिया से अपनी दूरी के लिए जाना जाता है.

इनकी महिलाएँ जीवन में केवल एक बार, शादी पर स्नान करती हैं और फिर खुदको साफ रखनेके लिए जड़ी-बूटियों को उबालकर उनकी भापका उपयोग करती हैं. यह जनजाति मुख्य रूप से पशुपालन, विशेषकर मवेशियों के पालन पर निर्भर है.

हिम्बा की महिलाएं अपने शरीर पर “ओत्जीज़े” नामक एक खास लेप लगाती हैं, जो जानवरों की चर्बी और लाल गेरू से बनता है. यह त्वचा को धूप से बचाने में मदद करता है और उन्हें एक विशिष्ट लाल रंग देता है. ये लोग पानी से ज्यादा नहीं नहाते हैं, खासकर महिलाएं। वे जड़ी-बूटियों को पानी में उबालकर और फिर भाप से खुद को साफ करती हैं.

यह जनजाति पितृसत्तात्मक समाज से जुड़ी हुई है, जिसमें बहुविवाह भी प्रचलित है. उनके सामाजिक ढांचे में कुछ प्रमुख विशेषताएं शामिल हैं:

प्रत्येक व्यक्ति दो कुलों से संबंधित होता है: एक मां की तरफ और दूसरा पिता की तरफ.

शादी के बाद, लड़कियां अपने परिवार को छोड़कर पति के गांव में चली जाती हैं, और बेटे अपने पिता के साथ रहते हैं. महिलाएं घर का काम करती हैं, जैसे खाना बनाना, लकड़ी इकट्ठा करना और बच्चे पालना. पुरुष जानवरों की देखभाल करते हैं और शिकार करते हैं.

हिम्बा लोग मक्का या बाजरे से बना दलिया खाते हैं, जिसे वे “महांगू” कहते हैं. शादी जैसे खास समारोह पर वे मीट खाते हैं.यह जनजाति मुख्य रूप से पशुपालन पर निर्भर करती है, जिसमें गायों, बकरियों और भेड़ों का पालन शामिल है.

हिम्बा ने अपनी सदियों पुरानी जीवनशैली और परंपराओं को बनाए रखा है. हालांकि, कुछ लोग आधुनिक जीवन शैली के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते हैं, जिससे उन्हें दोनों दुनियाओं में संतुलन बनाना पड़ता है.

डोगोन :

ये माली में रहते हैं और अपने खगोलीय ज्ञान और जटिल मुखौटा नृत्य के लिए प्रसिद्ध है. डोगोन जनजाति पश्चिम अफ्रीका के माली में, मुख्य रूप से बांदीआगरा और दोउएंत्ज़ा जिलों में रहने वाले एक आदिवासी समुदाय हैं, जो अपनी कला, वास्तुकला और खगोलीय ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं. ये लोग अपनी जटिल नक्काशीदार लकड़ी की मूर्तियों और ‘दामा’ नामक मुखौटा अनुष्ठानों के लिए जाने जाते हैं. उन्हें प्राचीन मिस्र के वंशज भी माना जाता है और वे सीरियस तारे और उसके मंडल (सिरियस ए, बी और सी) के बारे में सदियों से जानते हैं, जो वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बना हुआ है.

वे मुख्य रूप से माली में बांदी आगरा ढलान के पास रहते हैं, जो बलुआ पत्थर की चट्टानों से बनी एक ढलान है. इनकी आबादी लगभग 4,00,000 से 8,00,000 के बीच है. डोगोन लोग सदियों से सीरियस तारे और उसके तीन-तारा मंडल (सिरियस ए, बी और सी) के बारे में जानते हैं, जो वैज्ञानिकों द्वारा खोजे जाने से बहुत पहले था.

वे जटिल नक्काशीदार मुखौटों, लकड़ी की मूर्तियों और विशिष्ट वास्तु कला के लिए जाने जाते हैं. वे ‘दामा’ नामक अनुष्ठान करते हैं, जिसमें मृतकों के लिए नृत्य और मुखौटा प्रदर्शन शामिल होता है. वे कृषि और पशुपालन से अपना जीवन यापन करते हैं, जिसमें बाजरा और ज्वार जैसी फसलें शामिल हैं.

वोडाबे :

यह नाइजर और चाड में रहती है और अपनी ‘गेरेवोल’ परंपरा के लिए जानी जाती है, जिसमें पुरुष महिलाओं को आकर्षित करने के लिए नृत्य करते हैं. वोडाबे नाइजर, नाइजीरिया, चाड और कैमरून में रहने वाली एक खानाबदोश जनजाति है, जो फुलानी जातीय समूह का हिस्सा है.

वोडाबे अपनी पारंपरिक सौंदर्य प्रतियोगिताके लिए जाने जाते हैं, विशेष रूप से “गेरेवोल” उत्सव में, जहाँ पुरुष अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करते हैं और महिलाएँ अपने पसंदीदा पुरुष का चयन करती हैं. उनके सौंदर्य आदर्शों में लंबी कद-काठी, सफेद आँखें और चमकदार दांत शामिल हैं. वे उत्तरी कैमरून से चाड, नाइजर और उत्तर-पूर्वी नाइजीरिया तक सहेल क्षेत्र में घूमते रहते है.

उनकी अनुमानित जनसंख्या 1,60,000 से 2,00,000 के बीच है. वे फुला भाषा बोलते हैं. वे मुख्य रूप से खानाबदोश हैं. उनके पुरुष सौंदर्य प्रतियोगिता, “गेरेवोल” उत्सव के लिए प्रसिद्ध हैं. इस उत्सव में, पुरुष अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करने के लिए श्रृंगार करते हैं और नृत्य करते हैं, जबकि महिलाएँ उनमें से सर्वश्रेष्ठ को चुनती हैं.

पुरुषों के सौंदर्य आदर्शों में लंबी कद-काठी, सफेद आँखें और सफेद दांत शामिल हैं.

बेडौइन्स :

यह उत्तर अफ्रीका में रहने वाली एक अर्ध-खानाबदोश जनजाति है, जो ऊंट और बकरियां पालती है.अफ्रीका में “बेडौइन्स” कोई विशिष्ट जनजाति नहीं है, बल्कि यह एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है “रेगिस्तान निवासी”. यह पारंपरिक रूप से अरब प्रायद्वीप, उत्तरी अफ्रीका, और मेसोपोटामिया, लेवांत जैसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहने वाले खानाबदोश चरवाहों के समूह को संदर्भित करता है. ये लोग ऊँट और बकरियों जैसे पशुधन पालते हैं और अपनी विशिष्ट संस्कृति रखते हैं, हालाँकि आज इनमें से कई लोग स्थायी बस्तियों में रहते हैं.

वे सामाजिक संरचना के लिए जाने जाते हैं. वे मेहमानों के प्रति अपनी मेहमाननवाज़ी के लिए भी प्रसिद्ध हैं. बेडौइन के आतिथ्य में एक अनूठी परंपरा है, जिसमें मेहमानों को पहले भोजन करने दिया जाता है, और वे बिना सवाल पूछे तीन दिनों तक मेहमानों की मेज़बानी करते हैं.

पारंपरिक रूप से वे ऊँट का दूध और मांस खाते हैं, साथ ही रेगिस्तान से मिलने वाली अन्य चीज़ें भी खाते हैं.

बड़ी संख्या में बेडौइन इस्लामी धर्म का पालन करते हैं, हालाँकि कुछ अन्य समूहों के साथ भ्रमित हो सकते हैं, जैसे कि बेजा लोग, जो कुशिटिक भाषा बोलते हैं.

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि “बेडौइन” किसी एक जनजाति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली को दर्शाता है. अन्य खानाबदोश जनजाति जैसे कि तुआरेग और पिग्मी लोग, जिन्हें बेडौइन से भ्रमित नहीं करना चाहिए.

तेल की खोज और विकास जैसे आधुनिक परिवर्तनों ने कई बेडौइन्स को आधुनिक शहरी जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया है. हालांकि, उन्होंने अपनी कई पारंपरिक प्रथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखा है, जैसे कि संगीत, कविता और जनजातीय संरचनाएँ.

ज़ोसा :

यह दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली एक और प्रमुख जनजाति है, जिसका ज़ुलु और नडेबेले लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध है. ज़ोसा जनजाति दक्षिण अफ्रीका के एक बड़े जातीय समूह हैं, जो न्गुनी लोगों से संबंधित हैं और इसिखोसा भाषा बोलते हैं. वे सदियों से दक्षिण-पूर्वी अफ्रीका में रहते आए हैं और वर्तमान में देश के दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह हैं. ज़ोसा जनजाति पूर्वी केप प्रांत में बहुतायत में पाई जाती है, और जिम्बाब्वे में भी एक महत्वपूर्ण समुदाय है.

ज़ोसा मुख्य रूप से पूर्वी केप प्रांत में रहते हैं, लेकिन पश्चिमी केप, गौतेंग और क्वाज़ुलु-नटाल जैसे अन्य प्रांतों में भी इनकी बड़ी आबादी है. जिम्बाब्वे में भी एक छोटा समुदाय है. उनकी भाषा, इसिखोसा, एक बंटू भाषा है जिसमें क्लिक व्यंजन का उपयोग होता है. यह दक्षिण अफ्रीका की आधिकारिक भाषाओं में से एक है.

ज़ोसा लोग न्गुनी समूह के हैं और ज़ुलु, पोंडो, और थेम्बू जैसी अन्य न्गुनी जनजातियों के साथ सांस्कृतिक और भाषाई संबंध साझा करते हैं.

ऐतिहासिक रूप से, वे 7वीं शताब्दी से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं. ज़ोसा समाज में, परिवार का एक मुखिया होता है और प्रत्येक कुल का अपना प्रमुख होता है, जिसमें मातृवंश का प्रभाव है, कई प्रसिद्ध व्यक्ति, जैसे कि नेल्सन मंडेला और डेसमंड टूटू, ज़ोसा हैं और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

ज़ोसा लोगों के पूर्वज 7वीं शताब्दी से इस क्षेत्र में रह रहे हैं. उन्होंने पश्चिमी शिक्षा को अपनाया है और नेल्सन मंडेला और डेसमंड टूटू जैसे कई प्रभावशाली नेताओं को जन्म दिया है.

ज़ोसा लोग पूर्वजों की आत्माओं और एक सर्वोच्च सत्ता में विश्वास करते हैं. पारंपरिक रूप से, वे कृषि के समय को सितारों की स्थिति के आधार पर निर्धारित करते थे. वर्तमान में ज़ोसा संस्कृति ने शिक्षा, राजनीति और चिकित्सा जैसे कई क्षेत्रों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है.

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