निम्नलिखित गाना आप लोग एक बार ध्यान से पढ़ो. हो सके तो यू ट्यूब से सुनो तो, मन अवश्य प्रसन्न हो जायेगा.
गाने के बोल :
दर्पण को देखा,
तूने जब जब किया सिंगार.
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दर्पण को देखा,
तूने जब जब किया सिंगार
फूलों को देखा,
तूने जब जब आई बहार
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार
सूरज की पहली किरनों को,
देखा तूने अलसाते हुये
रातों में तारों को देखा,
सपनों में खो जाते हुये
यूँ किसी ना किसी बहाने
तूने देखा सब संसार
काजल की क़िस्मत क्या कहिये,
नैनों में तूने बसाया
आँचल की क़िस्मत क्या कहिये,
तूने अंग लगाया है
हसरत ही रही मेरे दिल में
बनूँ तेरे गले का हार….
उपरोक्त गाना फ़िल्म उपासना का है. फ़िल्म के संगीतकार थे कल्याणजी – आनंदजी. गीतकार थे, इन्दीवर जी और इसे सुरीले स्वरों से सजाया है, दर्दभरे गीतोंके गायक मुकेश जी ने.
सन 1971 की फिल्म “उपासना” के मुख्य कलाकारों में संजय ख़ान, मुमताज़ और फ़िरोज़ ख़ान शामिल हैं. इस फिल्म में हेलेन और असित सेन जैसे कलाकार भी थे.
संजय ख़ान : मोहन की भूमिका में.
मुमताज़ : शालू / किरण / आशा की
भूमिका में.
फ़िरोज़ ख़ान : राम की भूमिका में
(मोहन के भाई)
उपरांत हेलेन और असित सेन.
उपासना का मतलब होता है, पूजा
आराधना, इबादत, सेवन, भजना, मान सूचक पदवी, पूजा अर्चना और महिमा.
उपासना” 1971 की एक हिंदी फिल्म है, जिसका निर्देशन मोहन जे. बिजलानी ने किया है. इसमें संजय खान, मुमताज, और फिरोज़ खान जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है. फिल्म की कहानी दो भाइयों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी प्रेमिका शालू के हत्या के आरोप में अदालत में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं.
फिल्म में “आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं”, “दर्पण को देखा” और “मेरी जवानी प्यार को तरसे” जैसे मधुर गाने हैं. यह एक ड्रामा फिल्म है. इसका तेलुगु रीमेक “कर्पूर दीपम” नाम से बनाया गया था.
सारांश :
“उपासना” (1971) एक ड्रामा फिल्म है जो प्रेम, विश्वासघात और कानूनी संघर्ष की कहानी बयां करती है.यह अपनी स्टारकास्ट और यादगार संगीत के लिए जानी जाती है. फिल्म की कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ दो भाई अपनी प्रेमिका की सच्चाई सामने लाने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं.
अतिरिक्त जानकारी :
मल्लिका यूनिस के पुरस्कार विजेता उपन्यास “उपासना” पर आधारित एक मलयाली फिल्म “एन्ते उपासना” (1984) भी है, जिसमें ममूटी और सुहासिनी ने अभिनय किया था.
इस फिल्ममें गाने बेहद लोकप्रिय हुए थे.
उपरोक्त गाना ध्यान से पढ़ो तो आपको गीतकार ( कवि ) की दर्दभरी व्यथा नजर आती है. कवि को अपनी मासूका से शिकायत है. वह कहता है, कि जब भी कभी तू सजती सवरती हो, सिंगार करती हो तो दर्पण ( आइना ) देखती हो. जब मौसम की बहार आती है, तो तू फूलों को देखती हो. मगर मैं ऐसा बदनसीब हूं की मुझे आप देखना पसंद नहीं करती.
कवि आगे लिखता है कि सुबह सूरज की पहली किरण को तू आलसी होकर भी देखती है. सपनोमें खो जाकर तू तारोंको देखती हो, इसतरह किसी ना किसी बहाने तू हर संसार को देख लेती हो.
वो काजल कितनी किस्मत वाली है, जिसको आँखों में तूने लगाया है. वो आंचल भी किस्मत वाली है, जिसको तूने अपने अंग से लगाकर रखा है. एक अभिलाषा मनमे ही रही कि मैं तेरे गले का हार बनु ताकी हमेशा तेरे साथ रहू.
जितना ये गाना गीतकार इन्दीवर जी ने दिलसे लिखा है, उतनाही दर्दभरे सुरोके शहंशाह मुकेश जी ने इस गाने को रंगीन बना दिया है. ( समाप्त )
